हिन्दी-महिमा
हिन्दी की महिमा का
करते हम गुणगान।
विश्व की भाषाओं में
हिन्दी ही हमारी पहचान।
भाषाओं की यह आब,
जैसे उपवन में गुलाब।
बोलियाँ इसकी हैं निराली,
जैसे कोयल कूके मतवाली।
सौहार्द्र का पाठ पढ़ाती,
विषमताएँ दूर करती ।
इसमें हम सब मिल जाएँ,
अपनी कृत्रिम दिवार मिटाएँ ।
हिन्दी है पक्षी की भाँति,
प्रेषित करती प्यार की पाँति।
मात्राओं की आलाप है यह,
शब्दों का भण्डार है यह ।
समस्त रागों को बोल देती,
जीवन को झंकृत करती।
इसमें सार्थक सभी विधाएँ,
जन-जन का मन हर्षाएँ।
इतिहास-पुराण का है मेल,
विज्ञान-कला की है बेल ।
हिन्दी है गर्व हमारा,
देश बने स्वर्ग से न्यारा।
डाॅ अनीता पंडा 'अन्वी '
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