Saturday, December 25, 2021

मूल खासी (जनजातीय) संस्कृति में मानवीय मूल्य


 
मूल खासी समुदाय सदैव ही अपनी लोक-संस्कृति, परम्परा और मान्यताओं के साथ-साथ आदर्शों के साथ फलता-फूलता रहा है I इसका उद्देश्य एक स्वस्थ्य, सहज, सफल जीवन जीना है I इसके लिए बच्चों में आरम्भ से ही नैतिक मूल्यों का संस्कार देना इसका प्रमाण है I सफल जीवन एवं आदर्श नागरिक के लिए ऊँचे-ऊँचे आदर्शों की नहीं अपितु ईमानदारी तथा सच्चाई से बुजुर्गों या पूर्वजों द्वारा दी गई सीखों या नियमों का पालन करना आवश्यक है I यह जीवन का सही दिशा निर्धारित करता है और उसे आसान बनता है I अत: खासी पूर्वजों तथा वयोवृद्धों  ने जीवन के हर क्षेत्र में क्या करना चाहिए ? क्या नहीं ? इससे सम्बंधित शिक्षा या सीखें दी हैं, जिसका पालन आज तक खासी समुदाय के लोग कर रहे हैं I इन नियमों को फव्वारों अर्थात पदों के रूप में लिखा गया है I “का जिन्ग्सनेंग त्यम्में”(Ka Jingsneng Tymmen) अर्थात बुजुर्गों की सीखें / उपदेश, का पहला प्रकाशन सन 1897 में “राधोन सिंग बेर्री खर्वान्लांग” द्वारा खासी में हुआ, जो पहले मौखिक परम्परा में था I  उसके बाद इसका अनुवाद अंग्रेजी में (The Teaching Of Elders) “बिजोया सावियन” ने किया I इन फव्वारे  या पदों को बच्चे गाकर सीखते हैं I बड़ी ही सरल भाषा में लिखे गए ये फव्वारे मूल खासी आचार संहिता है, जिसमें ऊँचे नैतिक मूल्य हैं जो  श्रीमद्भागवत गीता, महाभारत आदि ग्रन्थों में वर्णित जीवन मूल्यों के सापेक्ष हैं I ये नैतिक मूल्य न केवल भावी पीढ़ी का मार्गदर्शन करती है अपितु उनका जीवन सहज, सुखद एवं सफल बनती है I “हमें बचपन से ही इन नियमों को सिखाया जाता था और हर रविवार हम इसे गा-गाकर याद करते थे इसलिए ये नियम हमें याद हैं और हर कदम पर हमारी सहायता करतें हैं बीच में यह परम्परा बंद-सी हो गई थी परन्तु इसे पुन: शुरू किया गया है ”, डॉ इबाबेट हेन्योता, सेकेट्ररी, साहित्य विभाग, सेंग सामला एवं सेंग खासी क्मिए कहती हैं I
       डॉ उमेश्वरी दखार लिखती हैं, “इन लोगो का विश्वास है कि ईश्वर ने उन्हें पृथ्वी पर आने का आदेश दिया और कहा कि वे कड़ी मेहनत करें और सच्चाई के मार्ग पर चलें I उनके अनुसार माव को जानना ही ईश्वर को जानना है I” ध्यताव्य है सामाजिक व्यवस्था हेतु मूल खासी धर्म एवं संस्कृति में मुख्यत: तीन सिद्धांतों का उल्लेख किया गया है, जो मानवता के उच्च आदर्शों और मूल्यों पर आधारित है  –
क.बन कमाई इया का होक (ban kamai ia ka hok) –
   इसका अर्थ है कि ईमानदारी से मेहनत करते हुए कमाओ I सच्चा जीवन का अर्थ है कि मनुष्य न केवल सत्य  बल्कि वह अपने सहयोगियों के साथ भी उतना ही ईमानदार रहे उसके सभी विचारों और इच्छाओं में ईमानदारी होनी चाहिए I 
ख.का टिपब्रिएव का तिप्ब्लेइ – (ka Tipbriew ka Tipblei) –
   इसका अर्थ है कि व्यक्ति का मानव तथा ईश्वर के प्रति संवेदनशील होना और उन्हें जानना I एक व्यक्ति को अपनी सेवा के प्रति हमेशा जागरूक रहना है I यह बात संकेत करती है कि मनुष्य ईश्वर को तब जान सकता है, जब वह अपने मानव जाति को समझता है I केवल उसे अपना कर्तव्य करना चाहिए I वह सबके प्रति दयालु सहायक हो I उसे ऐसा कार्य करना चाहिए , जिससे न केवल उसका भला हो, बल्कि सबके लिए अच्छा हो I उसे अपने स्वार्थ या ख़ुशी के लिए दूसरों नुकसान या चोट नहीं पहुँचाना चाहिए I 
ग. का तिप्कुर का तिप्खा (Ka Tipkur का Tipkha) – 
         इसका अर्थ है कि माता के खानदान या गोत्र और पिता के खानदान या गोत्र के संबंधों को जानना I एक व्यक्ति को अपने वंशज और उनके द्वारा किये गए पापों की भी जानकारी होनी चाहिए I जिससे आने वाली पीढ़ी उसकी पुनरावृत्ति न करे I 
    बाबू जीवन रॉय के अनुसार – चेतना या अंतर्मन ईश्वर (U Wei U Blei) का वरदान और आशीर्वाद है I खासी ऐसा मानते हैं कि हम किसी को पीठ पीछे या सामने निंदा करे या आलोचना करें, अंत में जब सच्चाई सामने आएगी तो लोग कहेंगे, “ वह बहुत बुरा था, वह पशु जैसा था I” वे आगे लिखते हैं – जो लोग अनैतिक कार्य जैसे – लूट-पाट और दूसरे गलत कार्यों में लगे रहते हैं, वे अपयश के भागी होते हैं और उन्हें अपनी अंतरात्मा के कारण कभी भी शांति नहीं मिलती I1 (अनुवाद) इस प्रकार इस जनजातीय संस्कृति में शुध्द अन्तकरण की शिक्षा दी गई है क्योंकि सत्य है कि व्यक्ति चाहे सबके समक्ष कितना भी मिथ्याचरण करें पर उसका अंतर्मन सदैव ही सत्य का अनुमोदन करता है I     
          आज सर्वत्र हिंसा और घृणा तथा आत्मप्रशंसा का वातावरण है I स्वयं को श्रेष्ठ साबित करने के लिए अक्सर दूसरों का अपमान करना एवं नीचा दिखाना जैसे आम बात हो गई है, ऐसे में निम्न फव्वारे में एक दूसरे का सम्मान करने, आदर के सतह उनसे बात करने की शिक्षा दी गई है I सर्वप्रथम अपने प्रभामंडल को सुदृढ़ बनाने का निर्देश दिया गया है I ध्यातव्य है कि मूल खासी संस्कृति कितनी विकसित रही होगी , जहाँ प्रभामंडल को मजबूत बनाने की बात की गई है –
भतीजे-भतीजियाँ, बच्चे और नाती-पोते,
आओ, बताऊँगा बनाना अपना प्रभामंडल* शक्तिशाली मैं तुम्हें;
कुछ देर के लिए बैठो, सुनो और सोचो,
मेरे निर्देशों को, कोई गलती मत करो;
स्मरण रहे, तुम सब भाई और बहन जैसे हो,
एक दूसरे से स्नेह करना मत भूलो;
हमेशा एक-दूसरे के साथ बात आदर से करो,
‘मा-में**’, ‘मा-फा’*** यानि ‘तुम’ कहने की मत आदत डालो I 

(*खासी समुदाय में यह विश्वास है कि हर व्यक्ति के शरीर के चारो ओर प्रभामंडल होता है I उसके स्थूल शरीर के चारो और सूक्ष्म शरीर होता है, जिसे प्रभावशाली बनाया जा सकता है I 
**’मा-में’ – पुरुषों के लिए , ***’मा-फा’ – महिलाओं के लिए प्रयोग किया जाता है, जिसका अर्थ है ‘तुम’ I इस शब्द का प्रयोग हम उम्र या अपनों से छोटों के लिए किया जाता है I अत: आदर और विनम्रता के साथ ‘मा-फी’ यानि ‘आप’ का प्रयोग करना चाहिए I) हमारी वैदिक संस्कृति में भी स्थूल शरीर से इतर सूक्ष्म शरीर अर्थात् प्रभामंडल की विस्तृत व्याख्या मिलती है और उसे प्रभावशाली बनाने के लिए सत्कर्म, ध्यान, योग आदि पर बल दिया गया है I सुमेर सिंग सावियन लिखते हैं – खासी लोगों मानते हैं कि “Rngiew” अर्थात् प्रभामंडल जो कि दिखाई नहीं देता परन्तु यह एक व्यक्ति के व्यक्तित्व को प्रभावशाली बनता है I यह व्यक्ति के तन और मन को आतंरिक बल प्रदान करता है I यह एक रक्षा कवच की भाँति है जिसे आध्यात्म एवं सुकर्मों द्वारा सुदृढ़ बना सकते हैं I जब कोई व्यक्ति बुरी आदतों का शिकार हो जाता है और बुरे कार्य में लिप्त हो जाता है, तो उसका रन्गीव या आभा क्षीण हो जाती है और वह अपनी आतंरिक चमक खो देता है और उसे दुर्भाग्य, पराजय और बिमारियाँ घेर लेती हैं I2 (अनुवाद) अत: अपने प्रभामंडल के सुदृढ़ता के लिए हमेशा सत्कर्म करने की शिक्षा पूर्वजों द्वारा दी गई है I   
    यह संस्कृति प्रेम का सन्देश देती है और “मातृ देवो भव” एवं “पितृ देवो भव” को व्याख्यायित करती है I संसार में माता-पिता के ऋण से मुक्त नहीं हुआ जा सकता है क्योंकि उनके कारण ही हमारा वजूद है I उन्हें ईश्वर के समान माना है अत: वे सदैव पूजनीय हैं -
अगर तुम्हारा सामना हो दुर्भाग्य और बुरे समय से,
कभी भी मत दो दोष माता-पिता को, इस दोष के लिए;
यह सबसे है अपवित्र कार्य, इसे तुम बढ़ावा न दो ,
तुम्हें माना जा सकता है भ्रष्ट, तुम्हारा नाम होगा बदनाम;
माता-पिता ईश्वर जैसे हैं, स्मरण रखें,
वे जिम्मेदार हैं तुम्हारे लिए, जब तक तुम छोटे थे;
धन्यवाद दो कि वे तुम्हें लाएँ हैं, इस संसार में,
प्यार और सम्मान करो उनका, इन सबके लिए;
बड़ों के सम्मान के साथ-साथ ईश्वर के प्रति आस्था रखना अत्यंत आवश्यक है I इनके दिखाए गए मार्ग का अनुसरण करना चाहिए तथा वाणी एवं आचरण में विनम्रता बनाए रखना चाहिए -
हमेशा अपने माता-पिता का सम्मान करो,
जगाने पर और उसके बाद हाथ जोड़कर ईश्वर की प्रार्थना करो;
अपने से बड़ों का आदर और अनुकरण करो,
जो भी तुम बोलो और जैसा व्यवहार करो;
फूहड़ और गन्दी बातों की उपेक्षा करो,
सदा अपनी बोलचाल और आचरण को सही रखो I
अपनी वाणी पर संयम रखना अत्यंत महत्वपूर्ण है I गलत शब्दों के प्रयोग ही अक्सर वैमन्यस्यता का कारण होते हैं I इसलिए संत कबीर ने कहा है – ऐसी वाणी बोलिए, मन का आप खोय I महाभारत में भी समस्त प्राणियों के प्रति कोमलता, व्यवहार में सरलता तथा मधुर भाषण को कल्याणकारी बताया गया है  -
मार्दवं सर्वभूतेषु व्यवहारेषु चार्जवम् I
वाक्चैव मधुर प्रोक्ता श्रेय एतदसंशयं II3 
 मूल खासी संस्कृति में सदैव ही अहिंसा पर बल दिया गया है और यहाँ पाप-पुण्य परम्परागत अर्थ में नहीं अपितु सभ्य-असभ्य आचरण के अर्थ में प्रयुक्त किया गया है I इस सभ्यता में अपने माता-पिता के निर्देशों का पालन करने की सीख दी गई है -
न करें प्रयोग गलत शब्दों का प्रयोग, है यह एक पाप, अपने से छोटों पर,
आ जाएँगी बुरी आदतें, इसे मत आने दो अपने अन्दर;
न ही देना किसी को गाली और न अपमान करना चाहिए,
मार-पीट भी कभी नहीं करनी चाहिए;
अपने घर से बहुत दूर मत खेलो,
अपने आँगन या बगीचे में खेलो;
जब तुम्हारे माता-पिता बुलाएँ, उन्हें अनसुना न करो,
चाहे तुम रहो पास या दूर, तुरंत जाओ I 
जीवन में सफलता प्राप्त करने के लिए बचपन से ही सुसंस्कारी बनना ज़रूरी है I इसके लिए बुजुर्गों ने बच्चों को आज्ञाकारी बनने की सीख दी है I बड़ों के उचित मार्गदर्शन से उनकी उन्नति का मार्ग प्रशस्त होगा और भविष्य सुरक्षित -
सदा आज्ञाकारी बनो, जिद मत करो,
सभी अच्छी सलाहों और निर्देशों को सुनो;
होगा तुम्हारा नाम ऊँचा और मिलेगा ईश्वर का आशीर्वाद इससे,
वर्तमान, भविष्य में और सदा के लिए I 
मूल खासी संस्कृति एक ऐसी जीवन शैली है जिसमें छोटी से छोटी बातों पर ध्यान देने की बात कही गई है I जैसे मिल-बाँट कर ख़ुशी से खाना, सदा बड़ों से माँग कर खाना, बाहर का खाना न खाना आदि और मूल खासी बुजुर्ग कहते हैं – ‘मत खाएँ ठंडा और जूठा बचा हुआ खाना’ क्योंकि बासी खाना सड़ जाता है और यह सेहत के लिए हानिकारक होता है I आज बढ़ते हुए फास्टफूड ने बच्चों से लेकर बड़ों के स्वास्थ्य को प्रभावित किया है अगर बचपन से ही हम ये गलत आदतें उनमें नहीं डालते तो सुरक्षित रहेंगे -  
जब भी मिले तुम्हें खाना, हमेशा बाँट कर खाएँ,
अपनों के बीच, बिना किसी को भूलें;
जब भी तुम्हारे माता-पिता खाने के लिए तुम्हें दें, 
सोचो और नखरा मत करो, खाओ प्रसन्नता से;
अगर चाहिए कोई व्यंजन विशेष तुम्हें,
अपनी मर्जी से मत खाओ, माँगो उनसे;
और अगर वह नहीं है घर में,
तो बाहर मत दौड़ो बिना परवाह किए उसे खरीदने के लिए;
क्योंकि तुम बन जाओगे शरारती और ख़राब हो जाएगी आदतें,.....
किसी भी चीज की अति अच्छी नहीं होती I कहा भी गया है - लालच बुरी बला है I लालच में आकर अधिक खाने से स्वास्थ्य पर बुरा असर पड़ता है और इस सच्चाई से नहीं इंकार किया जा सकता कि भले ही लोग आपको और खाने के लिए आग्रह करें पर आपको बहुत अधिक खाते देख मन ही मन हँसेंगे -
कभी भी लालच कर ज़रुरत से ज्यादा मत खाओ,
पड़ोगे तुम बीमार और हो जाएगी सेहत ख़राब;
यहाँ तक कि चावल भी ज़रुरत से ज्यादा मत लो,
रुक जाएगी तुम्हारी बाढ़ और तुम नहीं कर पाओगे विकास;
अगर तुम ज्यादा लालच करके अधिक हो खाते,
लोग नहीं करेंगे तुम्हें पसंद, करेंगे नापसंद वास्तव में;
वे बातें करेंगे, फैलाएँगे और तुम्हारा मजाक उड़ायेंगे,
होगी स्थिति उस जैसी, नहीं मिला कभी खाना जिसे I 
श्रीमद्भगवद्गीता में भी श्री कृष्ण अर्जुन को अनुशासन का उपदेश देते हुए कहते हैं कि हे अर्जुन ! बहुत अधिक कने वाले का योग (सिध्द) होता और न ही बिलकुल नहीं खानेवालों का; न तो बहुत अधिक सोने वालों का और न ही अधिक जगानेवाले का ही (योग सिध्द होता है )I यथा –
नात्यश्नतस्तु योगोऽस्ति न चैकान्तमनश्नतः I 
न चाति स्वप्नशीलस्य जाग्रतो नैव चार्जुन II16II 
मूल खासी नियमों के अनुसार प्रात: काल अमृत बेला में उठाने की शिक्षा दी गई है; इससे तन-मन-धन तीनों का लाभ होता है I जीवन में मेहनत और गतिशीलता ही उन्नति का रास्ता है I आज सम्पूर्ण भारत जिस स्वच्छता-अभियान की बात हम कर रहें हैं, मूल खासी संस्कृति में उनके पूर्वजों द्वारा पहले से कही गयी है और वे इस परम्परा को गंभीरता से निभाते आ रहे हैं I एशिया का सबसे स्वच्छ गाँव ‘मौलिलोंग” मेघालय में ही स्थित है -
आदत डाले तड़के सुबह उठने की,
हो सके,जब कौवा कांव-कांव करता है;
जब होती है कुकड़ू मुर्गे की,
लड़के और लड़कियाँ करें अपने कार्य और मेहनत करें;
जैसे ही आप उठें, आग जलाएँ,
चुस्त बनें , गतिशील बनें, रोगी होने का बहाना न बनाएँ;
देखभाल करें अपने घर की, झाड़ें, व्यवस्थित करें,
अंदर-बाहर स्वच्छ करे और साफ करें; 
तब अपने हाथ और चेहरे को भी धोएँ,
धन की देवी साथ होगी आपके;
मूल खासी संस्कृति में भी ‘अतिथि देवो भव’ माना जाता है I खासी घरों में ‘पान’ (Tympew) और सुपारी (Kwai) से अतिथियों का हमेशा सम्मान और स्वागत किया जाता है I पान गलत तरीके से मत मोड़ो – कहकर इसे सही ढंग से पेश करने की बात कही है I इसके साथ अतिथियों के लिए कहा गया है – ‘जब तुम किसी के यहाँ घूमने जाओ, ज्यादा दिन मत रुको’, इन सब सीखों द्वारा यह ज्ञात होता है कि लोकाचार और दैनिक जीवन हर कार्यों को कैसे सही तरीके से करें ? इसे बहुत सूक्ष्मता से समझाया गया है, जो बहुत प्रासंगिक हैं -
जब भी लोग आए और तुमसे मिलना,
उनका स्वागत करो और बैठाओ भी;
उनके बैठने के थोड़ी देर बाद,
उन्हें कुछ पान-सुपारी  दो, 
पान को गलत तरीके से मत मोड़ो,
जिसको भी तुम दो, यह गलती नहीं होनी चाहिए,
अगर वे चाहे तो कुछ चूना भी दो,
चाकू की नोक से कभी न दो,.....
मूल खासी संस्कृति आत्मनिर्भर बनने एवं कर्म करने की सीख देती है, चाहे वह कृषि हो या व्यापार का क्षेत्र I यह नई-नई तकनीक सीखने की प्रेरणा देता है I सनातन काल से ही इस विश्व को कर्म प्रधान माना गया है रामचरितमानस में भी गोस्वामी तुलसीदास ने कर्म महत्ता का वर्णन करते हुए कहा है कि 
कर्म प्रधान विश्व रचि राखा I जो जस करहि सो तस फल चाखा II 
सकल पदारथ है जग माँही I कर्महीन नर पावत नाहीं II
अर्थात् यह संसार कर्म प्रधान है, जो जैसा करता है वैसा ही फल पता है I इस संसार में सभी वस्तुएँ उपलब्ध हैं लेकिन कर्महीन व्यक्ति को कुछ भी प्राप्त नहीं होता I मूल खासी संस्कृति में कर्म को प्रधानता दी गई है और उसे सफलता का मूल मन्त्र माना गया है I ध्यातव्य है कि जनजातीय क्षेत्र होने के कारण यहाँ व्यापार आदि के क्षेत्र में उतना विकास नहीं हुआ था अत: देश के अन्य भागों से लोग यहाँ व्यापार करने आए थे अत: उनसे व्यापार आदि का आरम्भ हुआ I निम्न फव्वारे में विनम्रता के साथ नयी तकनीक अपनाने की सलाह दी गई है इससे सिध्द होता है कि इनके पूर्वज कितने दूरदर्शी थे  -
सीखो व्यापार करना और तुमलोग करो कुछ व्यापार,
उत्तर, दक्षिण, पूर्व और पश्चिम से,
चाहे पूँजी थोड़ी कम हो,
अगर तुम करोगे कोशिश, तुम्हें हमेशा उसका मूल्य मिलेगा,
तुम्हें अपने प्लेट में खाने की कभी नहीं होगी कमी I 
अगर तुम अपना काम सीमित रखोगे, तो आलसी बन जाओगे I 
सीखो रखना अपना बही-खाता हमेशा सही,
रखो अपना दिमाग सही, जब तुम सोओ और जागो,
और सीखो उनलोगों से जो बाहर से आएँ हैं,
कैसे व्यवहार करना है ? क्या गलत और क्या सही है ?
संतुलित करो अपने विचारों और सोच को,
तुम तब तरक्की करोगे, सफल और वैभवशाली बनोगे I 
निष्कर्षत: मूल खासी (जनजातीय) संस्कृति में सामाजिक मानवीय मूल्यों को व्याख्यायित करें तो ज्ञात होता है कि यह एक ऐसी विकसित जीवन-शैली है, जो अपने ऊँचे मूल्यों और आदर्शों के साथ आज भी मेघालय राज्य में जीवित है, जो इतने प्रासंगिक हैं कि लगता है कि आज की परिस्थितियों के लिए निर्मित हों I ध्यातव्य है कि यह संस्कृति मूलत: मानवता के सिध्दांतों पर आधारित है I कांग (बहन) सिल्बी पाशाह, वरिष्ठ सदस्या, साहित्य विभाग, सेंग खासी संस्था के अनुसार – प्राचीन काल से ही हमारे पूर्वजों ने मानव की सेवा और ईमानदारी से अपना  कर्म करने को ही असली धर्म बताया है क्योंकि यह आदेश ईश्वर द्वारा इंसानों को दिया गया है I हमारे समाज में सामूहिक सेवा एवं श्रमदान की परम्परा आज तक चल रही है I  
      19 वीं सदी मिशनरियों के आगमन तथा ईसाई धर्म के प्रचार-प्रसार और उससे जुड़े नियमों ने यहाँ की जनजातीय आस्था एवं सामुदायिक संस्थाओं को बहुत क्षति पहुँचाई है I आधुनिक सभ्यता के प्रभाव तथा विदेशी शासन ने इस संस्कृति पर निरन्तर प्रहार किया I जिससे इसका अनुसरण करने वालों की संख्या सिमटती गई अपने मूल्यों के संरक्षण एवं संवर्धन हेतु कई चुनौतियाँ आज भी हैं परन्तु देर से ही सही अल्पसंखक मूल खासी समुदाय में जागरूकता आई I यद्यपि धर्म-परिवर्तन आदि के प्रहार ने मूल खासी संस्कृति को मानने वालों को अल्पसंख्यक बना दिया है तदपि पूर्वोत्तर के अन्य जनजाति संस्कृति की भाँति मिटी नहीं है कारण जिस संस्कृति में इतने उच्च आदर्श एवं नैतिक मूल्य हों, उसकी जड़ें उतनी ही मजबूत होंगी I जनजातीय संस्कृति को पिछड़ा हुआ मानना समीचीन नहीं है I आज तेज़ी मिटती जनजातीय संस्कृति एक गहन चिंता का विषय है अत: आवश्यकता है इनको जानने की, संरक्षण-संवर्धन एवं जागरूकता की I 


संदर्भ ग्रन्थ –
1. Shaphang “UWei UBlei” / About one God by Jeevan Roy, Translated By Bijoya Sawian : 2005 : Chapt. About Our Conscience : page no. 45, 46.
2. Golden Vine of Ri Hynniewtrep : The Khasi Heritage by Sumer Sing Sawian : 2011: chapt. The Rngiew : page no. 17. ( The Khasi --------------illness and diseases.)
3. महाभारत – शांति पर्व 287 वां अध्याय 
4. The Teaching Of Elders / Ka Jingsneng Tymmen Part I & II Radhon Sing Berry Kharwanlang Translated By Bijoya Sawian : 2016
5. श्रीमद्भगवद्गीता (सप्तम संस्करण), ध्यानयोग – 6 अध्याय I
6. रामचरितमानस- बालकाण्ड I  
7. Protection Of The Religious Practices Of “Niam Khasi & Niam Tre” A Legal Study by Umeshwari Dakdar page no. 17-18 :2015.
8. Ka Shad Suk Mynsiem, Centary Souvenir (2005), by Seng Khasi Seng Kmie.
9. साक्षात्कार - डॉ इबाबेट हेन्योता, सेकेट्ररी, साहित्य विभाग, सेंग सामला, सेंग ख्य्ननाह एवं सेंग खासी क्मिए I 
10. साक्षात्कार - कांग सिल्बी पाशाह, वरिष्ठ सदस्या, साहित्य विभाग, सेंग खासी संस्था, संरक्षिका लोकगीत एवं पारम्परिक संगीत, समाज सेवी I  
11. An Interview with Dr Hayley Dora Kharnarbi Donn, Assit. Professor, Martin Luther Christen University, Shillong. 
   - डॉ अनीता पंडा, शिलांग

Friday, December 24, 2021

हिन्दी महिमा

हिन्दी-महिमा

हिन्दी की महिमा का 
करते हम गुणगान। 
विश्व की भाषाओं में 
हिन्दी ही हमारी पहचान। 
        भाषाओं की यह आब, 
         जैसे उपवन में गुलाब। 
          बोलियाँ इसकी हैं निराली, 
          जैसे कोयल कूके मतवाली। 
सौहार्द्र का पाठ पढ़ाती, 
विषमताएँ दूर करती ।
इसमें हम सब मिल जाएँ, 
अपनी कृत्रिम दिवार मिटाएँ ।
          हिन्दी है पक्षी की भाँति, 
          प्रेषित करती प्यार की पाँति। 
           मात्राओं की आलाप है यह,
           शब्दों का भण्डार है यह ।
समस्त रागों को बोल देती, 
जीवन को झंकृत करती। 
इसमें सार्थक सभी विधाएँ, 
जन-जन का मन हर्षाएँ। 
         इतिहास-पुराण का है मेल, 
          विज्ञान-कला की है बेल ।
          हिन्दी है गर्व हमारा,
           देश बने स्वर्ग से न्यारा। 
डाॅ अनीता पंडा 'अन्वी '

Sunday, May 10, 2009

एक और बुद्धन आएगा डाॅ अनीता पंडा खामोशी से निकल गया था वह,विकास की तलाश में अर्जित करने ज्ञान का प्रकाश कुछ रश्मियाँ हाथ आईं सरस्वती की कृपा थी उस परबढ़ता गया बिना सीढ़ियों के जीवट था, हर पल थपेड़ा सहताजन्मगत अभिशाप काचाह थी उसे केवल अपने समुदाय के विकास कीअपनी मिट्टी, वन कीअपने ढोल, नृत्य की अपनी स्त्रियों की अस्मिता कीबेमौत मारे जाते युवाओं कीकिसान से मजूर बनने की प्रक्रिया कादला गया वह, मारा गया, प्राप्त था उसे कानूनन अधिकार समानता का, अनभिज्ञ था वह, शिक्षित समाज से विचारों के दोगलेपन सेउसके लौटने का है इन्तजार आखिरी साँस के पहले, उसे निहार ले, छू ले नहीं पता है माँ को निकल गया है वह खामोशी से नहीं लौटता है कोई वहाँ सेबुद्धन, लिए ज्ञान का प्रकाश अब कभी नहीं आएगा पर आत्मा नहीं होगी पराजित एक और बुद्धन आएगा। Typing